ग्रहो की अवस्था और उनके फल

ग्रहोंकी अवस्था और उनके फल

कुछ मित्र ग्रहों की डिग्री आदि के हिसाब से उनकी अवस्था के फल जानना चाहते है । आप ग्रहों की ये अवस्था देखकर उनके फल का अनुमान लगा सकते है । और आपके कोई भी सवाल हैं या ज्योतिष से संबन्धित कोई भी जानकारी या ज्योतिष मे कुछ और क्या सीखना चाहते है तो आप नीचे comment जरूर करे।
खासकर ज्योतिष का अध्यन करने वाले विध्यार्थी जरूर जाने इन बातो को ।

ग्रहों की दिप्तादि अवस्थाएँ


१. दीप्त- जो ग्रह अपनी उंच या मूलत्रिकोण राशि में हो दीप्त अवस्था का कहलाता है। उत्तम फल देता है।
२. स्वस्थ- जो ग्रह अपनी ही राशि में हो स्वस्थ कहलाता है शुभफलदायी होता है।
३. मुदित- जो ग्रह अपने मित्र या अधिमित्र की राशि में हो मुदितवस्था का ग्रह होता है और शुभफलदायी होता है।
४. शांत- जो ग्रह किसी शुभ ग्रह के वर्ग में हो वो शांत कहलाता है और शुभ फल प्रदान करता है।
५. गर्वित- उच्च मूलत्रिकोण राशि का ग्रह गर्वित अवस्था में होता है उत्तम फल दायी होता है।
६. पीड़ित – जो ग्रह अन्य पाप ग्रह से ग्रस्त हो पीड़ित कहलाता है और अशुभफलप्रदान करता है।
७. दीन- नीच या शत्रु की राशि में दीन अवस्था का होता है अशुभफलदायि होता है।
८. खल- पाप ग्रह की राशि में गया हुवा ग्रह खल कहलाता है और अशुभ फलदायी होता है।
९. भीत- नीच राशि का ग्रह भीत अवस्था का होता है और अशुभफलदायि होता है।
१०. विकल – अस्त हुवा ग्रह विकल कहलाता है शुभ होते हुवे भी फल प्रदान नही कर पाता। मित्रों इस प्रकार ये ग्रह की अवस्था हुई जिनसे आप पता लगा सकते हो की कोई ग्रह आपको कितना और कैसा फल देगा ।

ग्रहों की लज्जितादि ६ अवस्थाएं


१. लज्जित – जो ग्रह पंचम भाव में राहु केतु सूर्य शनि या मंगल से युक्त हो वह लज्जित कहलाता है जिसके प्रभाव स पुत्र सुख में कमी और व्यर्थ की यात्रा और धन का नाश होता है।
२. गर्वित- जो ग्रह उच्च स्थान या अपनी मूलत्रिकोण राशि में होता है गर्वित कहलाता है। ऐसा ग्रह उत्तम फल प्रदान करता है और सुख सोभाग्य में विर्धि करता है।
३. क्षुधित – शत्रु के घर में या शत्रु से युक्त क्षुधित कहलाता है अशुभ फलदायी कहलाता है।
४. तृषित – जो ग्रह जल राशि में सिथत होकर केवल शत्रु या पाप ग्रह से द्रिस्ट हो तृषित कहलाता है। इस से कुकर्म में बढ़ोतरी बंधू विवाद दुर्बलता दुस्ट द्वारा क्लेश परिवार में चिन्ता धन हानि स्त्रियों को रोग आदि अशुभ फल मिलते है।
५. मुदित- मित्र के घर में मित्र ग्रह से युक्त या द्रिस्ट मुदित कहलाता है शुभफलदायी होता है।
६. छोभित- सूर्य के साथ सिथत होकर केवल पाप ग्रह से दीर्स्ट होने पर ग्रह छोभित कहलाता है।
विशेष – जिन जिन भावों में तृषित क्षुधित या छोभित ग्रह होते है उस भाव के सुख की हानि करते है।

ग्रहों की जागृत आदि अवस्थाएं


मित्रों ग्रहों की तिन अवस्था होती है

१. जागृत।
२. स्वप्न ।
३ सुषुप्ति अवस्था।

प्रत्येक राशि को १० १० के तिन अंशो में बांटे है ।
विषम राशि यानी पहली ,तीसरी ,पाँचमि ,सातवीं ,नोवी और ग्यारवीं के पहले भाग यानी एक से दस अंश तक कोई ग्रह हो तो वो जागृत अवस्था में होगा।
१० से २० तक स्वप्न और २० से ३० अंश तक हो तो सुषुप्ति अवस्था में होगा।
इसके विपरीत सम राशि यानी दूसरी ,चौथी ,छटी, आठवीं ,दसवीं और बारवीं में यदि कोई ग्रह १ से १० अंश तक का हो तो सुषुप्ति अवस्था में ,११ से २० तक में स्वप्न अवस्था और २० से ३० तक जागृत अवस्था में होगा ।
ग्रह की जागृत अवस्था जातक को सुख प्रदान करती है और ग्रह पूर्ण फल देने में सक्षम होता है । स्वप्न अवस्था का ग्रह मध्यम फल देता है और सुषुप्ति अवस्था का ग्रह फल देने में निष्फलि माना जाता है।
इसी प्रकार ग्रहों की बालादि अवस्था होती है।
विषम राशि में १ से ६ अंश तक बाल्यावस्था, ६ से १२ अंश तक कुमारावस्था ,१२ से १८ अंश तक युवा ,१८ से २४ विरद्ध और २४ से ३० अंश तक मिर्त अवस्था होती है।
सम राशि में १ से ६ मिर्त ,६ से १२ विरद्ध ,१२ से १८ युवा ,१८ से २४ कुमार ,२४ से ३० बाल्यावस्था का काल होता है।
बाल्यावस्था में ग्रह अत्यंत न्यून फल देता है। कुमारावस्था में अर्द्ध मात्रा में फल देता है । युवावस्था का ग्रह पूर्ण फल देता है। विर्धावस्था वाला अत्यंत अल्प फल देता है और मिर्त अवस्था वाला ग्रह फल देने में अक्षम होता है।है ।

ग्रहों का बलाबल


मित्रों फलित ज्योतिष में जातक के फलादेश में और अधिक स्पष्ठता और सूक्ष्मता लाने हेतु ग्रहों के बलाबल और अवस्था का ज्ञान होना परम् आवश्यक है। ग्रहों के बलाबल ६ प्रकार के होते है जो इस प्रकार है

१. स्थान बल :- जो ग्रह उंच राशिस्थ सवगरहि मित्र राशिस्थ मूलत्रिकोण राशिस्थ सवद्रेष्कनस्थ आदि सववर्गों में सिथत हो , इसके अतिरिक्त अष्टक वर्ग में ४ से अधिक रेखाएं प्राप्त हो तो वो स्थानब्ली कहलाता है। । इसके अतिरिक्त एक अन्य मान्यता के अनुसार स्त्री ग्रह स्त्री राशि में और पुरुष ग्रह पुरुष राशि में बलि माने जाते है।
२.दिक् बल :- बुद्ध गुरु लग्न में चन्द्र शुक्र चोथे भाव में शनि सप्तम भाव में और सूर्य मंगल दसम भाव में दिक् बलि माने जाते है
३. काल बल :- चन्द्र मंगल शनि राहु रात्रि में और सूर्य गुरु दिन में बलि होते है । शुक्र मध्यान्ह में और बुद्ध दिन रात दोनों में बलि होता है।
४. नैसर्गिक बल :- शनि से मंगल ,मंगल से बुद्ध ,बुद्ध से गुरु, गुरु से शुक्र ,शुक्र से चन्द्र, चन्द्र से सूर्य क्रमानुसार ये ग्रह उत्तरोत्तर बलि माने जाते है।
५. चेष्ठा बल :- सूर्य चंद्रादि ग्रहों की गति के कारण जो बल ग्रहों को मिलता है उसे चेष्ठा बल कहते है। सूर्य से चन्द्र उतरायनगत राशियों (मकर से मिथुन राशि पर्यन्त) में हो तो चेष्ठा बलि होते है । तथा क्रूर ग्रह सूर्य द्वारा दक्षिणायन गत ( कर्क से धनु राशि पर्यन्त ) राशियों में बलि माने जाते है। मतांतर से कुंडली में चन्द्र के साथ मंगल बुद्ध गुरु शुक्र शनि हो तो कुछ ब्लॉन्तित हो जाते है। कुछ विद्वान चेष्ठा बल को अयन बल भी कहते है। इसी प्रकार शुभ ग्रह वक्री हो तो राशि सबंधी सुखो में विर्धि करते है और पाप ग्रह वक्री हो तो दुःखो में विर्धि करते है।
६. दृक् बल :- जिस ग्रह पर शुभ ग्रहों की दृष्टी पड़ती हो उसे दृक बलि कहते है।
बुद्ध गुरु शुक्र और बलि चन्द्र यानी पूर्णमाशी के आसपास का चन्द्र शुभ ग्रह कहलाते है मंगल सूर्य क्रूर और राहु केतु शनि पापी ग्रह कहलाते है।
इन सबके साथ ग्रहों की अस्ठ्कवर्ग में सिथ्ती , उनका ईस्ट फल कष्ट फल , वो किसी नक्षत्र में है और उसका नक्षत्र स्वामी और उस राशि का स्वामी कन्हा सिथत है, ग्रह का उनसे कैसा मैत्री सम्बन्ध सम्बन्ध है आदि का अध्ययन करने के बाद ही फलित के अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है

ग्रहों का शयनादि अवस्था फल


फल कथन में ग्रहों का शयनादि अवस्था फल अत्यन्त प्रभावी देखा गया है किन्तु व्यवहार में वर्तमान ज्योतिर्विद इन्हें कम ही प्रयोग में लाते देखे गए हैं। शयनादि अवस्था का प्रयोग करते समय जहां तक स्त्री-पति, संतान व रोगादि सुख-दुख की बात है तो उस विषय में स्त्री-पति, संतान, रोगादि सुख-दुख योग भी देखना आवश्यक है। ज्योतिष के किसी भी भाग व अंगादि को ज्योतिष नियमों के अंतर्गत ही प्रयोग करना चाहिए। इसके साथ ही ज्योतिष योग फल में शास्त्रों द्वारा वर्णित फलकथन में केवल संकेत व कथनभाव ही ग्रहण करना चाहिए न कि संपूर्ण शब्दार्थ।

ग्रहों का शयनादि अवस्था।

1. शयन अवस्था अर्थात निद्रा अथवा सम्भोग से पूर्व विश्राम / आनन्द हेतु लेटी हुई अवस्था।
2. उपवेशन अवस्था अर्थात बैठी हुई अवस्था
3. नेत्रपाणि अवस्था अर्थात नेत्रों पर हाथ रखे हुए अवस्था
4. प्रकाशन अवस्था अर्थात रोशन व प्रज्वलित अवस्था
5. गमन अवस्था अर्थात प्रस्थान अवस्था
6. आगमन अवस्था अर्थात आना / प्रस्तावना अवस्था
7. सभा अवस्था अर्थात सम्मेलन अवस्था
8. आगम अवस्था अर्थात वृद्ध / बढ़ना (Augment) अवस्था
9. भोजन अवस्था अर्थात भोजन ग्रहण करना अवस्था
10. नृत्यलिप्सा अवस्था अर्थात नृत्य करने की इच्छा / लोलुपता अवस्था
11. कौतुक अवस्था अर्थात जिज्ञासा अवस्था
12. निद्रा अवस्था अर्थात सोई हुई अवस्था


1. सूर्य :-

(i). शयन अवस्था :- जिसके जन्म समय में सूर्य शयन अवस्था में हो उसे सदा मन्दाग्नि रहती है, पैर मोट (हाथी पांव रोग) हो सकता है, पित्त जन्य रोग से दुखी रहता है, भगन्दर हो सकता है व हृदय शूल रोग से भी पीड़ित हो सकता है।
(ii).उपवेशन अवस्था :- जिसके जन्म समय में सूर्य उपवेशन अवस्था में हो तो वह मनुष्य दरिद्रता भोगी, कलह प्रपंच में निरत व कठोर चित्त होता है।
(iii). नेत्रपाणि अवस्था :- सूर्य नेत्रपाणि अवस्था में होने से जातक सदा सुखी, ज्ञानी, परोपकारी, पुष्ट शरीर वाला, सुखी और राज्यकुल से विशेष आदर पानेवाला होता है।
(iv). प्रकाशन अवस्था :- प्रकाशन अवस्था में सूर्य होने से जातक उदार चित्तवाला, धनी, सभा में उचित वाणी बोलने वाला, विशेष पुण्य करने वाला, बली और सुन्दर शरीर वाला होता है।
(v). गमन अवस्था :- गमन अवस्थागत सूर्य मनुष्य परदेश अथवा घर से दूर रहने वाला, अनेक कष्ट भोगने वाला, आलसी, बुद्धि और धन से हीन, क्रोधी किन्तु भय से विह्वल रहने वाला होता है।
(vi). आगमन अवस्था :- आगमन (मलिन) अवस्थागत सूर्य होने से जातक परस्त्री भोगी, अपने परिवार से अलग रहने वाला, विशेष लाभार्थ लोभ करने वाला, यात्रा करने वाला, कृपण, नीच कर्म करने वाला और दुष्टमति वाला होता है।
(vii). सभा अवस्था :- सभा अवस्थागत सूर्य होने से जातक परोपकारी, सदा रत्नादि धनों से युक्त, धनि, गुणी, दयालु, मित्र तथा परिवारों का पालन करने वाला, पृथवी, भूषण और नए नए वस्त्रों का सुख भोगने वाला होता है।
(viii). आगम अवस्था :- सूर्य के आगम अवस्था में होने से जातक शत्रुओं के झण्झट से सदा व्याकुल होने वाला, चंचल, दुर्बल, दुष्टबुद्धि वाला, धर्म -कर्म से हीन तथा मदान्ध होता है।
(ix). भोजन अवस्था :- यदि सूर्य भोजन अवस्था में हो तो जातक वायु – गठिया रोगादि से पीड़ित होता है, अन्य स्त्रियों के साथ बार बार व्याभिचार (अर्थात वेश्यागामी / पर स्त्री-परपुरुष इत्यादि) होने के कारण धन और बल का नाश करता है,
विशेष- झूठ बोलता है, निन्दित कार्यों में चित्त लगाता है व शराब / नशीले पदार्थ, अन्न – भोजन ग्रहणकरने में रुझान रख सकता है।
(x). नृत्यलिप्सा अवस्था :- सूर्य नृत्यलिप्सा अवस्थागत होने से जातक विद्वान, साहित्य शास्त्र का प्रेमी और सदा राजकुल से विशेष आदर पाने वाला होता है।
(xi). कौतक अवस्था :- यदि सूर्य कौतक अवस्था में हो तो उस मनुष्य सदा प्रसन्नचित्त, ज्ञानी, यज्ञ करने वाल, राजगृह में रह कर वहां प्रबन्ध करने वाला, शत्रु रुपी हाथियों में सिंह के समान गर्जन करने वाला, तथा प्रसन्नता से साहित्य शास्त्र में कला कौशल दिखाने वाला होता है।
(xii). निद्रा अवस्था :-यदि सूर्य निद्रावस्थागत हो तो वह मनुष्य की दोनों आंखें नींद से भरी हुई, सुर्खी लिए होती हैं, परदेश अथवा घर से दूर रहना विशेष पसन्द करता है, स्त्री व संचित धन की हानी होती है।


2. चन्द्र :-

(i). शयन अवस्था :- जिसके जन्म समय में चन्द्र शयन अवस्था में हो वह जातक अधिक प्रतिष्ठा चाहने वाला, शरीर में शीत प्रधान रोग वाला, कामातुर व सञ्चित धन का नाश करने वाला होता है।
(ii).उपवेशन अवस्था :- जिसके जन्म समय में चन्द्र उपवेशन अवस्था में हो तो वह मनुष्य रोगी, बुद्धिहीन, धनहीन, निर्दयी, अपना धन नाश करने वाला, और दूसरे के धन को लूटने वाला (ठग, लूटेरा, ठग इत्यादि) हो सकता है।
(iii). नेत्रपाणि अवस्था :- नेत्रपाणि अवस्था में जातक रोगी, अत्यन्त झूठ बोलने वाला, धूर्त तथा सदा कुकर्म करने वाला होता है।
(iv). प्रकाशन अवस्था :-प्रकाशन अवस्था में चन्द्र होने से जातक अपने सदगुणों से राजकुल में प्रतिष्ठा पाकर, मिले हुए सुन्दर गृह, हाथी – घोड़ा, सुन्दर वस्त्रों से युक्त, अपनी रमणि के साथ नित्य विहार करता हुआ अन्त में तीर्थ यात्रादि भी करता है।
(v). गमन अवस्था :- यदि कृढ्ण पक्ष चन्द्रमा गमन अवस्थागत में हो तो वह मनुष्य अत्यन्त पाप करने वाला, दूसरे को सुखी देख द्वेश करने वाला, सर्वदा नेत्र रोग से कष्ट पाने वाला होता है। यदि चन्द्रमा शुक्ल पक्ष ला हो तो विशेष डरपोक होता है।
(vi). आगमन अवस्था :- आगमन अवस्थागत चन्द्र होने से जातक व्यर्थ अभिमानी, पैरों के रोग से दुखी, छिप कर पाप करने वाला, दरिद्र, बुद्धि तथा संतोष से हीन होता है।
(vii). सभा अवस्था :- जिस जातक के पूर्ण चन्द्रमा सभा अवस्थागत हो तो वह जातक अति बुद्धिमान, गुणवान, सबक्के साथ प्रेम करनेवाला, राजा से आदर पाने वाला, कामदेव के समान सुन्दर कान्ति पाने वाला, स्त्री के कामवेग को शीघ्र शान्त करने वाला होता है।
(viii). आगम अवस्था :- शुक्ल पक्षगत चन्द्र के आगम अवस्था में होने से जातक विशेष बोलने वाला धर्मात्मा होता है। यदि चन्द्रमा कृष्णपज़ का होकर आगम अवस्था में हो तो उसकी दो स्त्रियां होती हैं, वह रोगी, अत्यन्त दुष्ट और हठी होता है।
(ix). भोजन अवस्था :- यदि पूर्ण चन्द्र भोजन अवस्था में हो जातक प्रतिष्ठावान होता है। उसको वाहन, नौकर व स्त्री पुत्र का सुख होता है। यदि इस अवस्था में चन्द्रमा कृष्ण पक्ष का हो तो सब सुखों को नष्ट कर देता है।
(x). नृत्यलिप्सा अवस्था :- यदि शुक्ल पक्ष का चन्द्र नृत्यलिप्सा अवस्थागत हो वह जातक बलवान, गीत गानेवाला व रसायन शास्त्र (medical scirnce / chemical science) का जानने वाला होता है। यदि चन्द्रमा कृष्ण पक्ष का हो तो जातक पापकर्म करने वाला होता है।
(xi). कौतुक अवस्था :- यदि चन्द्र कौतक अवस्था में हो तो वह मनुष्य राजा (उच्च पदाधिकारी) होता है, धनवान होता है, रति क्रीड़ा में सर्वदा कुशल और वेश्याओं के साथ रमण करने में अति चतुर होता है।
(xii). निद्रा अवस्था :- यदि बृहस्पति के साथ साथ चन्द्रमा निद्रावस्थागत हो तो वह मनुष्य सब प्रकार से सुखी होता है। यदि कन्या राशि (कृष्ण पक्ष) का होकर उक्त अवस्थागत हो तो सञ्चित धन का नाश होता है और उसका घर खंडहर बन जाता है अर्थात खस्ता हालत बन जाती है।


3. मंगल :-

(i). शयन अवस्था :- जिसके जन्म समय में मंगल शयन अवस्था में हो तो वह मनुष्य दाद, खाज – खुजली रोग से विशेष पीड़ित होता है।
(ii).उपवेशन अवस्था :- जिसके जन्म समय में मंगल उपवेशन अवस्था में हो तो तो वह मनुष्य बलवान, सदा पापकर्म करने वाला, झूठ बोलने वाला, सदा प्रपञ्च करने वाला, धनवान किन्तु कर्म धर्म से रहित होता है।
(iii). नेत्रपाणि अवस्था :- यदि मंगल नेत्रपाणि अवस्था में लग्न में हो तो उस जातक को दरिद्रता सताती है, यदि उक्त अवस्थागत दूसरे भाव में हो तो वह शहर का मालिक अर्थात धनवान होता है।
(iv). प्रकाशन अवस्था :- प्रकाशन अवस्था में मंगल होने से जातक के गुण का प्रकाश होता है, वह परदेश अर्थात जन्म स्थल से दूर रहता है, राजा से सर्वदा आदर पाता है, यदि मंगल उक्त अवस्थागत पांचवें घर में बैठा हो तो वह मनुष्य अपने स्त्री – पित्र से अलग होकर रहता है। यदि राहू के साथ मंगल हो तो वह मनुष्य वृक्ष अर्थात ऊंचे स्थान से गिर जाता है।
(v). गमन अवस्था :- यदि मंगल गमन अवस्थागत हो तो वह मनुष्य प्रतिदिन सफ़र में रहता है, फोड़ा – फुंसी से अदिक दुखी रह्ता है, स्त्री से कलह करता है, दाद, खाज – खुजली से विशेष कष्ट पाता है और धन का नाश करता है।
(vi). आगमन अवस्था :- आगमन अवस्थागत मंगल होने से जातक विशेष गुणवान होता है, मणियों की माला पहनता है, तीक्षण तलवार पहता है अर्थात हथियार रख सकता है, वाहन सुख देता है, शत्रों का नाश करता है व स्वजनों का कष्ट दूर करता है।
(vii). सभा अवस्था :- मंगल उच्चस्थ सभा अवस्थागत होने से जातक युद्ध कला में अति प्रवीण, धार्मिक ऐर धनाड्य होता है; यदि उक्त अवस्थागत होकर मंगल पांचवें या नौंवे भाव में हो तो तो जातक मूर्ख होता है, यदि बारहवें भाव में हो तो स्त्री – पुत्र व मित्र से हीन करता है किन्तु उक्त स्थानों में मित्र के घर मंगल हो तो मनुष्य राज सभा में पंडित होता है, धनाड्य, मानी और दानी भी होता है।
(viii). आगम अवस्था :- मंगल के आगम अवस्था में होने से जातक धर्म – कर्म से हीन होता है, रोगी रहता है, परिश्रम से डरता है, नीच जनों के संग रहता है व कान के नीचे शूल रोग से दुखी हो सकता है।
(ix). भोजन अवस्था :- यदि मंगल भोजन अव्स्था में हो तो उस मनुष्य को मीठा आहार अधिक अच्छा लगता है, सदा निन्दित कर्म करता है और अपनी प्रतिष्ठा अपने हाथों खो बैठता है
(x). नृत्यलिप्सा अवस्था :-मंगल नृत्यलिप्सा अवस्थागत होने से जातक को राजा से विशेष धन प्राप्त होता है, सदा आभूषण युक्त रहता है और उसको उत्तम गृह रहने के लिए मिलता है।
(xi). कौतक अवस्था :- यदि मंगल कौतक अवस्था में हो तो मनुष्य नाच तमाशा विशेष देखता है, मित्र, पुत्र, परिवार से युक्त रहता है। यदि मंगल उच्च का होकर कौतुक अव्स्थागत हो तो मनुष्य राज दरबार का पंडित व बुद्धिमानों में आदरणीय होता है।
(xii). निद्रा अवस्था :- यदि मंगल निद्रावस्थागत हो तो वह मनुष्य क्रोधी होता है, बुद्धि और धन से हीन होता है, धूर्त कर्म हीन और रोगी होता है।


4. बुध :-

(i). शयन अवस्था :- जिसके जन्म समय में बुध शयन अवस्था में लगन में हो तो वह मनुष्य भूख से व्याकुल रह्ता है, लंगड़ा होता है, गुञ्जा की तरह लाल आंखें होती हैं। यदि उक्त अवस्थागत अन्य भावों में हो तो लम्पट और धूर्त होता है।
(ii).उपवेशन अवस्था :- जिसके जन्म समय में बुध उपवेशन अवस्था में हो तो वह जातक सदगुणों से पूर्ण होता है, यदि बुध पाप ग्रह से देखा जाता हो अथवा पाप युक्त हो तो मनुष्य दरिद्र होता है। यदि वह बुध मित्र गृह अथवा अपने उच्च में बैठा हो तो मनुष्य धनि होता है।
(iii). नेत्रपाणि अवस्था :- नेत्रपाणि अवस्था में जातक विद्या और बुद्धि से हीन होता है, किसी के साथ सद व्यवहार नहीं करता और मिथ्याभिमानि रहता है। यदि उक्त अवस्थागत बुध पांचवें भाव में हो तो पुत्र और स्त्री का सुख नहीं मिलता, कन्या विशेष पैदा होती है और वह पुरुष राजकुल में पंडित तथा आदरणीय होता है।
(iv). प्रकाशन अवस्था :- प्रकाशन अवस्था में बुध होने से जातक दान देने वाला, दया करने वाला, अनेक विद्याओं का विद्वान, ज्ञान पूर्ण और दुष्टों का घमण्ड विध्वंस करने वाला होता है।
(v). गमन अवस्था :- गमन अवस्थागत बुध होने से मनुष्य का सर्वदा विदेधों में आना-जाना लगा रहता है, राजकुल से विशेष पृथवी मिलती है, अच्छा सुन्दर महल मिलता है और उसके घर में लक्षमी दासियों की तरह टिकी रहती है।
(vi). आगमन अवस्था :- आगमन अवस्थागत बुध होने से गमन अवस्था जैसा फल ही प्राप्त होता है।
(vii). सभा अवस्था :- जन्म काल में बुध अपने उच्च का होकर सभा अवस्थागत हो तो उस मनुष्य का धन शीघ्र बढ़ जाता है, धनी होता है, धार्मिक होता है व अन्त में प्रभु भक्ति में लीन होने से मोक्ष प्राप्त करता है।
(viii). आगम अवस्था :- बुध के आगम अवस्था में होने से जातक नीच जनों की सेवा से कार्य सिद्धि पाता है, उसको दो पुत्र होते हैं तथा प्रतिष्ठा देने वाली एक कन्या भी होती है।
(ix). भोजन अवस्था :- यदि बुध भोजन अव्स्था में हो तो उस मनुष्य क सर्वदा वाद-विवादसे धन नाश हुआ करता है, राजभय (दण्ड से दुर्बल और चञ्चल रहता है, बुद्धि डांवाडोल रहती है व स्त्री तथा धन का सुख नहीं मिलता।
(x). नृत्यलिप्सा अवस्था :- बुध नृत्यलिप्सा अवस्थागत होने से जातक प्रतिष्ठित होकर अनेक तरह की वाहनों व रत्नों आदि से सुखी, प्रतापी मित्र व पुत्रों से युक्त होता है, पंडितों की सभा में वक्ता होता है।
यदि उक्त अवस्थागत बुध पाप ग्रहों की राशि में बैठा हो तो वह मनुष्य वेश्या (अथवा पर पुरुष / स्त्री) के साथ कुकर्म करता है।
(xi). कौतक अवस्था :- जन्म समय बुध लग्न गत कौतुक अव्स्था में हो तो उस मनुष्य को गान विद्या अनायास / कम परिश्रम से आ जाती है।
यदि उक्त अवस्थागत बुध सातवें या आठवें भाव में हो तो वह वेश्या के साथ रमण करता है, यदि वह नौवें भाव में हो तो मनुष्य जन्म पर्यन्त पुण्य करके अन्त में मोक्ष प्राप्त करता है।
(xii). निद्रा अवस्था :- यदि बुध निद्रावस्थागत हो तो वह मनुष्य निद्रा से तृप्त नहीं होता, सर्वदा कष्ट से पीड़ित रहता है, भाइयों के विरोध अथवा कलह से संतप्त रहता है, परिवार में कलह रहता है और उसकी प्रतिष्ठा तथा धन का नाश हो जाता है।


5. गुरु :-

(i). शयन अवस्था :- जिसके जन्म समय में गुरु शयन अवस्था में हो तो वह मनुष्य बलवान होता हुआ भी कम आवाज़ (मधुर वाणी) से बोलता है, गौरांग और हनु लम्बा होता है और सर्वदा शत्रुओं के भय से दुखी रहता है।
(ii).उपवेशन अवस्था :- जिसके जन्म समय में गुरु उपवेशन अवस्था में हो तो वह जातक चालबाज़, घमण्डी होता है। राजकुल और शत्रुवर्गों के कलह से सदा संतप्त रहता है, पैर, जंघा, मुंह, हाथ में फ़ुंसी-फ़ोड़ा के कष्ट से दुखी रहता है।
(iii). नेत्रपाणि अवस्था :- नेत्रपाणि अवस्था में जातक रोगी रहता है, बड़प्पन और संपत्ति से हीन होता है, नाच-गान में विशेष प्रेम रखता है, सदा गौरन्ग रहता है और कुलहीन स्त्री (वेश्या) से प्रेम रखता है।
(iv). प्रकाशन अवस्था :- प्रकाशन अवस्था में गुरु होने से जातक को गुणों में आनन्द देने वाला, अच्छे सुखों को भोगने वाला बनाता है, धनी, सर्वदा अपनी शान से रहता हुआ, ईश्वर में आस्था रखते हुए उच्च पदवी पर पहुंचता है और अपने कुलानुसार अति धनाड्य हो जाता है।
(v). गमन अवस्था :- गमन अवस्थागत गुरु हो तो मनुष्य साहसी होता है, सर्वदा स्त्री, पुत्र और मित्र गणों के सुख से युक्त रहता है, प्रसन्नचित्त वाला विद्वान और अनेक प्रकार के धनों से युक्त होता है।
(vi). आगमन अवस्था :- आगमन अवस्थागत गुरु होने से जातक की स्त्री अति सुन्दर होती है और उसके घर में धन- लक्षमी सदा विराजमान रहते हैं।
(vii). सभा अवस्था :- सभा अवस्थागत गुरु होने से जातक बृहस्पति के समान बोलने वाला, धनि, इच्छानुकूल धन, मणि – आभूषण, वाहन का सुख भोगने वाला और अनेक विद्याओं का जानने वाला होता है।
(viii). आगम अवस्था :- गुरु के आगम अवस्था में होने से जातक को विभिन्न वहनों का सुख व नौकर, स्त्री, पुत्र, मित्र का यथेष्ट सुख मिलता है, षट शास्त्रज्ञ होता है, राजा की तरह निरन्तर सुख करता है, शुद्ध बुद्धि (विकार रहित) होती है, काव्य / साहित्य कौशल में अत्यन्त प्रेम रखता है, सर्वदा फ़ूसरे की भलाई करता है और सर्वत्र उसकी प्रतिष्ठा होती है।
(ix). भोजन अवस्था :- यदि गुरु भोजन अव्स्था में हो तो उस मनुष्य को सदा देवान्न (अच्छा अन्न) मिलता है, वह धनी, सुखी व विभिन्न वाहन सुख भोगता है।
(x). नृत्यलिप्सा अवस्था :- गुरु नृत्यलिप्सा अवस्थागत होने से जातक राजा से प्रतिष्ठा पाने वाला, विशेष धन वाला, सदा धर्म में तत्पर रहने वाला, तन्त्र शास्त्र का जानने वाला, पंडितों में आदर पाने वाला, शीघ्रस्फ़ुरण बुद्धि वाला पण्डित होता है।
(xi). कौतक अवस्था :- यदि गुरु कौतक अवस्था में हो तो जातक खेल तमाशा करने वाला, विशेष धन वाला, अपने कमल रुपी वंश में सूर्यप्रकाश करने वाला अर्थात कुलदीपक, अत्यन्त दया करने वाला, सर्वदा सुख भोगने वाला, पुत्र और भूमी से युक्त, नम्र स्वभाव वाला, बलशाली व राजकुल का पंडित होता है।
(xii). निद्रा अवस्था :- यदि गुरु निद्रावस्थागत हो तो वह मनुष्य हर कार्य मूर्खता से करता है, दरिद्र होता है और उसके घर से पुण्य विमुख होकर अरण्यरोदन करते हैं।


6. शुक्र :-

(i). शयन अवस्था :- जिसके जन्म समय में शुक्र शयन अवस्था में हो तो वह मनुष्य बलवान होने पर भी दांत के रोग से दुखी, महाक्रोधी, धनहीन होता है और वेश्या के साथ प्रेम होने पर भी उस से संयुक्त नहीं होता है।
(ii).उपवेशन अवस्था :- जिसके जन्म समय में शुक्र उपवेशन अवस्था में हो तो वह मनुष्य आभूषणों से सुशोभित रहता है, उसके शत्रुओं का नाश हो जाता है और वह आदर पूर्वक राजा से अपनी प्रतिष्ठा उन्नति की उन्नति करता है।
(iii). नेत्रपाणि अवस्था :- नेत्रपाणि अवस्था में यदि शुक्र लग्न, सातवें या दस्वें भाव में हो तो उस मनुष्य को आंखों की हानी हो सकती है, धन का नाश भी होता है। उक्त अवस्था में यदि शुक्र इन भावों से अन्य भावों में हो तो उसको सदा रहने के लिए उत्तम घर मिल जाता है।
(iv). प्रकाशन अवस्था :- यदि शुक्र प्रकाशन अवस्था में अपने उच्च, अपने घर या अपने मित्र के घर में हो तो मनुष्य मदान्ध बड़े बड़े हाथियों के क्रीड़ा (फंसाने) में चतुर होता है, राजा की तरह सुखी, साहित्य शास्त्र – कला कौशल का जानने वाला और भजन गाने वाला होता है।
(v). गमन अवस्था :- गमन अवस्थागत शुक्र होने से जातक की मात शीघ्र मर जाती है, शत्रुओं के भय से अपने परिवार के साथ रहता है और कभी अलग भी रहता है।
(vi). आगमन अवस्था :- आगमन अवस्थागत शुक्र होने से जातक अत्यन्त धनी होता है, सदा तीर्थ यात्रा किया करता है, सर्वदा गमन रहता है और उसके हाथ – पैर में कष्ट रहता है।
(vii). सभा अवस्था :- सभा अवस्थागत शुक्र होने से जातक बिना अधिक कोशिश से जल्दी ही राज सभा में पहुंच कर अपनी विद्या से पूर्ण प्रतिष्ठा पाता है, प्रबल श्त्रुओं के समूह को मारने वाला होता है, अच्छे वाहन युक्त व अति धनी श्रेष्ट जातक होता है।
(viii). आगम अवस्था :- शुक्र के आगम अवस्था में होने से जातक को लाभ नहीं होता, शत्रुओं के विवाद से संचित धन का नाश होता है, पुत्र व परिवार की हानि होती है, शरीर में कष्ट और स्त्री के भोग विलास से रहित अर्थात नपुंसक होता है।
(ix). भोजन अवस्था :- यदि शुक्र भोजन अवस्था में हो तो उस मनुष्य भूख से पीड़ित रहता है, शरीर से कष्ट पाता है, अनेक श्त्रुओं के भय से दुखी रहता है, स्त्री सम्बन्ध ( ससुराल) से विशेष धन पाता है और पंडितों द्वारा युक्त / पूजित होता है।
(x). नृत्यलिप्सा अवस्था :- शुक्र नृत्यलिप्सा अवस्थागत होने से जातक काव्य शास्त्र में प्रवीण और सदा विशुद्ध बुद्धि वाला, गानधुन / ताल-सुर व संगीत बाजा आदि में चतुर होता है और उसका धन नित्य बढ़ता रहता है।
(xi). कौतक अवस्था :- यदि शुक्र कौतक अवस्था में हो तो जातक इन्द्र की तरह सभा में आदर पाता है अर्थात बहुत आदर पाता है, उसकी विया बड़ी शुद्ध होती है व वह धनवान होता है।
(xii). निद्रा अवस्था :- यदि शुक्र निद्रावस्थागत हो तो वह मनुष्य दूसरे की सेवा / नौकरी करता है, दूसरे की निन्दा करता है, दूसरे के लिए वीर होता है, वाचाल अर्थात दुष्ट बुद्धि ठग होता है और दुखी होकर पृथवी में जहां – तहां ठोकर खाता फ़िरता है।


7. शनि :-

(i). शयन अवस्था :- जिसके जन्म समय में शनि शयन अवस्था में हो वह भूख और प्यास से पीड़ित रहता है अर्थात पेटभर अन्न – जल नहीं मिलता, अति परिश्रम से थका हुआ रहता है, प्रथम अवस्था में रोगी, उसके बाद धनी और सुखी हो जाता है।
(ii).उपवेशन अवस्था :- जिसके जन्म समय में शनि उपवेशन अवस्था में हो तो वह जातक प्रचण्ड शत्रुओं के झंझट से अति दुखी और सदा धन का नाश करने वाला होता है। दाद – चर्म रोग से युक्त, अभिमानी और राज दण्ड से सदा संतप्त रहता है।
(iii). नेत्रपाणि अवस्था :- नेत्रपाणि अवस्था में जातक दूसरे के द्रव्य से अति धनि हो जाता है, राजा की प्रसन्नता से अति प्रसन्न होकर, कला – कौशल दिखा कर सदा शुद्ध बुद्धि से काम लेता है।
(iv). प्रकाशन अवस्था :- प्रकाशन अवस्था में शनि होने से जातक अनेक सदगुणों से युक्त तथा भूमी और धन से युक्त होता है, सर्वदा सदविचार करता है, सुन्दर तेजयुक्त शरीर पाकर दीन बन्धु और ईश्वर का भक्त भी होता है।
(v). गमन अवस्था :- गमन अवस्थागत शनि होने से जातक धन्वान, संतान युक्त, पापकर्मों से डरने वाला, शत्रुओं को दबाकर राज्य जीतने वाला और पंडितों में पंडितराज कहला कर राज सभा में विशेष आदर पाने वाला होता है।
(vi). आगमन अवस्था :- आगमन अवस्थागत शनि होने से जातक पैर के रोग से दुखी होता है, पुत्र -स्त्री के सुख से रहित होता है, दरिद्र होता है व एकान्त स्थान में वास करने के लिए पृथवी में भटकता फ़िरता है।
(vii). सभा अवस्था :– सभा अवस्थागत शनि होने से जातक रत्न – आभूषण पहन कर प्रसन्नता प्राप्त करता है, नीतिज्ञ होता है और अत्यन्त प्रभावशाली भी होता है।
(viii). आगम अवस्था :- शनि के आगम अवस्था में होने से जातक को रोग कब्ज़े में किए रहता है, उसकि चाल अथवा काम लरने की गति धीमी होती है और वह मनुष्य कभी भी किसी से कोई वस्तु मांगना नहीं चाह्ता अर्थात सब आवश्यकता के सामानों से परिपूर्ण होता है।
(ix). भोजन अवस्था :- यदि शनि भोजन अवस्था में हो तो उस मनुष्य षटरस भोजन करता है, नेत्ररोगी होता है और मूर्खता से भ्रम जाल में फ़ंसकर उसकी बुद्धि संतप्त रहा करती है।
(x). नृत्यलिप्सा अवस्था :- शनि नृत्यलिप्सा अवस्थागत होने से जातक धर्मिष्ठ, धनी, राजा से आदर पाने वाला, गम्भीर और युद्ध स्थान में अति बलवान होता है।
(xi). कौतक अवस्था :- यदि शनि कौतक अवस्था में हो तो जातक पृथवी तथा धन से परिपूर्ण, शरीर से अति सुखी, सुन्दर स्त्री से युक्त और काव्य शास्त्रों में प्रवीन होता है।
(xii). निद्रा अवस्था :- यदि शनि निद्रावस्थागत हो तो वह मनुष्य सदा धनी, सद्गुणों से युक्त, साहस करने वाला, प्रचण्ड शत्रुपक्ष को विध्वंस करने वाला और अति सुंदर वेश्याओं के साथ रमण करने में अति चतुर होता है।


8. राहू :-

(i). शयन अवस्था :- जिसके जन्म समय में राहू शयन अवस्था में हो उस जातक को रोग सताया करता है और अनेक कष्तों से दुखी रहता है। यदि राहू उक्त अवस्था में मेष, वृष, मिथुन व कन्या राशि में हो तोवह व्यक्ति धन्वान होता है।
(ii).उपवेशन अवस्था :- जिसके जन्म समय में राहू उपवेशन अवस्था में हो तो मनुष्य दाद / चर्म रोगों से दुखी रहता है, दरिद्र होता है किन्तु राज सभा में आदर पाता है और मानी होता है।
(iii). नेत्रपाणि अवस्था :-नेत्रपाणि अवस्था में जातक के नेत्रों में कष्ट रह्ता है, नीच मनुष्य, सर्प, शत्रु व चोरी का भय रह्ता है और उसका संचित धन नष्ट हो जाता है।
(iv).प्रकाशन अवस्था :- प्रकाशन अवस्था में राहू होने से जातक को उच्च पद मिलता है, श्रेष्ट कर्म करता है, अच्छी बुद्धि को प्राप्त करता है, धन और गुण की विशेष उन्नति करता है और राजकुल से प्राप्त प्रतिष्ठा दूर तक फैलती है, उसकी कान्ति मेघ समान श्याम होती है व विदेश से भी प्रतिष्ठा पाता है।
(v). गमन अवस्था :- गमन अवस्थागत राहू मनुष्य को बहुत संतानवाला, पंडित, धनवान, दान करनेवाला, राजा से आदर पानेवाला और श्रेष्ठ / आदर्श जातक होता है।
(vi). आगमन अवस्था :- आगमन अवस्थागत राहू होने से जातक क्रोधी, सदा बुद्धि और धन से हीन, खल, कृपण और अति कामी होता है।
(vii). सभा अवस्था :- सभा अवस्थागत राहू होने से जातक पंडित, कृपण, अनेक गुणों से युक्त, धन व शरीर सुख से संपन्न होता है।
(viii). आगम अवस्था :- राहु के आगम अवस्था में होने से जातक शत्रुओं के भय से घबराया हुआ रहता है, बन्धु वर्ग से बहुत ही विवाद रहता है, धन की हानि होती है, कृपण होता है, शरीर से कमज़ोर रहता है व इस सब के कारण परिवार हीन दशा में होता है।
(ix). भोजन अवस्था :- यदि राहू भोजन अव्स्था में हो तो उस मनुष्य को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता, बुद्धि हीन, कर्म – धर्म से हीन, स्त्री – पुत्र सुख से बंचित होता है।
(x). नृत्यलिप्सा अवस्था :- राहू नृत्यलिप्सा अवस्थागत होने से जातक को रोग कष्टकारक होते हैं, आंखों मे कष्ट, शत्रु से भय व धर्म – कर्म हीन होता है।
(xi). कौतक अवस्था :- यदि राहू कौतक अवस्था में हो तो उस मनुष्य का घर स्थिर नहीं रहता, परस्त्रीगामी और पराये धन का अपहरण करनेवाला होता है।
(xii). निद्रा अवस्था :- यदि राहू निद्रावस्थागत हो तो वह मनुष्य अनेक गुणों से युक्त, किसी गांव या संस्थान का मुखिया, स्त्री – पुत्र से युक्त, गम्भीर घमण्डी और धनी होता है।


9. केतू :-

(i). शयन अवस्था :- यदि क्र्तू मेष, वृष, मिथुन अथवा कन्या राशि मे शयनागत अव्स्था में हो तो उस जातक का धन विशेष बढ़ता है। अन्य राशिगत होने से रोग विशेष बढ़ता है।
(ii).उपवेशन अवस्था :- जिसके जन्म समय में केतू उपवेशन अवस्था में हो तो उस जातक को दाद – चर्म रोग अधिक बढ़ता है, शत्रु, राजा, सर्प और चोंरों से कष्ट पाने की आशंका सदा बनी रहती है।
(iii). नेत्रपाणि अवस्था :- जन्म समय यदि केतू नेत्रपाणि अवस्था में हो तो जातक को नेत्रों मे रोग होता है, दुष्टजन, सर्प इत्यादि से भय होता है, शत्रु और राजकुल से भी अनेक उपद्रव का भय होता है, धन का नाश हो जाता है और जातक की बुद्धि अत्यन्त चंचल हो जाती है।
(iv). प्रकाशन अवस्था :- प्रकाशन अवस्था में केतू होने से जातक के धन – धान्य की वृद्धि होती है, राज दरबार में प्रतिष्टा पाता है, उसका यश दूर तक फ़ैलता है और परदेश से विशेष धन पाता है।
(v). गमन अवस्था :- गमन अवस्थागत केतू से मनुष्य संतान और धन से युक्त होता है, विद्वान होकर राजकुल से प्रतिष्ठा पाता है और बहुत बड़ा धन्वान हो जाता है।
(vi). आगमन अवस्था :- आगमन अवस्थागत केतू होने से जातक दुष्ट स्वभाव वाला, धनहीन कामातुर, बुद्धि तथा धर्म से रहित, क्रोधी और कृपण होता है।
(vii). सभा अवस्था :- सभा अवस्थागत केतू होने से जातक कुटिल, घमण्डी, कृपण, कामी और द्गूर्त विद्या में अति निपुण होता है
(viii). आगम अवस्था :- केतू के आगम अवस्था में होने से जातक महापापी होता है, परिवारों से विरोध करता है, दुष्ट स्वभाव वाला होता है और शत्रु तथा रोग से दुखी होता है।
(ix). भोजन अवस्था :- यदि केतू भोजन अवस्था में हो तो वह मनुष्य क्षुधा से नित्य दुखी रहता है और दरिद्रता के कारण भ्रमण करता फ़िरता है।
(x). नृत्यलिप्सा अवस्था :- केतू नृत्यलिप्सा अवस्थागत होने से जातक रोग से विकल रहता है, उसकी बुबुदाकार (सदा पानी देने वाली) होती हैं, अत्यन्त साहसी, वाचाल व नीच कर्म करने वाला होता है।
(xi). कौतक अवस्था :- यदि केतू कौतक अवस्था में हो तो वह जातक खेल तमाशा करने वाला, नर्तकी स्त्रियों के साथ भोग विलास करने वाला, दूसरे गृह से ग्जर करने वाला, दुष्ट कर्म में रत रहने वाला और धन्हीन होकर जहां तहां ठोकरें खाता फ़िरता है।
(xii). निद्रा अवस्था :- यदि केतू निद्रावस्थागत हो तो वह मनुष्य द्रव्य तथा अन्न के खजाना से अति सुखी होता है, अनेक प्रकार के गुणों तथा व्यवसायों से सुखपूर्वक समय व्यतीत करता है।

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